Sunday, 26 December 2021
Saturday, 13 November 2021
योग्य जनों को मिला ‘पद्म सम्मान’
Tuesday, 29 June 2021
जीवन में आत्मविश्वास: डॉ. पुनीत द्विवेदी
आत्मविश्वास शब्द दो शब्दों का संयोजन है आत्म और विश्वास अर्थात् स्वयं पर विश्वास। स्वयं पर विश्वास तब होगा जब स्वयं पर नियंत्रण होगा। जीवन के सभी क्रियाकलापों पर नियंत्रण कर सक पाना आसान नहीं। कुछ वाह्य क्रियाकलापों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं रहता। नियंत्रण नहीं हो पाने से हमें दुख होता है। और दुख हमारी मानसिकता को नकारात्मकता की ओर अग्रसर करता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। समस्याओं के समाधान का सबका अपना-अपना तरीक़ा होता है। जब चीज़ें हमारे अनुसार होतीं हैं तो हमारा आत्मविश्वास और बढ़ता जाता है। और इसके विपरीत जब चीज़ें हमारे अनुसार नहीं होती हैं तो धीरे-धीरे हमारा आत्मविश्वास भी कमजोर होने लगता है। जीवन के संघर्ष भी आत्मविश्वास को बढ़ाने या घटाने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। यदि वातावरण का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि हमारा जीवन राजनीतिक वातावरण, आर्थिक वातावरण, सामाजिक परिवेश, तकनीकी परिवेश और क़ानूनी वातावरण के आस पास ही घूमता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इन वातावरणों से प्रभावित रहता ही है।आत्मविश्वास के और मज़बूत होने में इन वातावरणों की महती भूमिका होती है। इन पर नियंत्रण कर सक पाना मुश्किल है परंतु इनके साथ स्वयं को समायोजित कर लेना बुद्धिमत्ता है। उस व्यक्ति का आत्मविश्वास सबसे अधिक मज़बूत होता है जो अपना काम आसानी से निकलवा लेता है। वह अवसरोचित अपनी बुद्धि का समुचित उपयोग करता है जिससे कि बाधाओं से बचा जा सके और कम समय में अपना कार्य आसानी से पूर्ण किया जा सके। कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होने पर आत्म विश्वास और प्रबल होता है। अत: जीवन में सकारात्मकता के साथ अपनी बुद्धि और विवेक की अवसरोचित उपयोग कर अपने अभीष्ट की सिद्धि करना ही विजेता होना है। ऐसा जीवन जीने वाला व्यक्ति के भीतर असीम ऊर्जा का संचार होने लगता है और वह सदा जीतता जाता है। उसका आत्मविश्वास और बढ़ता जाता है।
Sunday, 20 June 2021
योग: कर्मसु कौशलम् : सनातन ने विश्व के कल्याण के लिये योग दिया - डॉ. पुनीत द्विवेदी
Monday, 7 June 2021
नीयत, नीति और निरंतर परिश्रम से सकारात्मक नतीजों की समीक्षा कर गये प्रधानमंत्री मोदी- डॉ. पुनीत द्विवेदी
नीयत, नीति और निरंतर परिश्रम से सकारात्मक नतीजों की समीक्षा कर गये प्रधानमंत्री मोदी- डॉ. पुनीत द्विवेदी
आज के अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने वैक्सीनेशन हेतु देश की जनता से एक भावनात्मक अपील की। विगत साठ वर्ष का हवाला देकर यह बताया कि वैक्सीन को लेकर कैसे विगत कई वर्षों से भारतीय समाज की उपेक्षा की जाती रही है। विदेशों पर वैक्सीनेशन हेतु हमारी निर्भरता हमें सदा खलती रही है। प्रधानमंत्री का यह बिंदु आँखें खोल देने वाला था कि पोलियो, चेचक और हेपेटाईटिस-बी आदि के टीके जब विदेशों में लग जाते थे तब भारत का नंबर आता था। जिसमें कई बार १०-१० वर्ष तक लग जाते थे; और हम घुट-घुट कर मरते संघर्ष करते रहते थे। दो बड़े स्वदेशी वैक्सीन निर्माताओं के आगे आने से देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है। वैक्सीन के लिये अब हम आत्मनिर्भर हो चुके हैं। विदेशों की राह तकना अब बंद हुआ है। जिसका श्रेय देश के प्रतिभावान वैज्ञानिकों एवं वैक्सीन उत्पादक दोनों कंपनियों को जाता है।
प्रधानमंत्री के अनुसार दूसरी लहर से अभी हमारी लड़ाई जारी है । जिसमें वैक्सीन जीवन रक्षक के रूप में पहचानी गयी है। कोविड प्रोटोकॉल का मौलिकता से पालन करना ही हमारे लिये सुरक्षा कवच है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ के माध्यम से वैक्सीन की डोज़ प्रत्येक नागरिक तक शीघ्र पहुँचाने की बात को भी प्रधानमंत्री ने प्रमुखता से उठाया। वैक्सिनेशन अभियान का मज़ाक़ उड़ाने वालों, भारतीय वैज्ञानिकों की मेधा शक्ति पर प्रश्न चिह्न लगाने वालों को प्रधानमंत्री ने आड़े हाथों लिया। भारतीय वैक्सीन के प्रभाव को लेकर अनैतिक रूप से फैलाये जा रहे भ्रम को भी प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के साथ धोखा बताया। भोले-भाले नागरिकों को वैक्सीन के संबंध में भ्रमित जानकारी देकर उन्हें वैक्सीन लगवाने से रोकना; उनके स्वास्थ्य अर्थात् जीवन के साथ खिलवाड़ बताया। ऐसे भ्रम फैलाने वाले से जनता को सतर्क रहने की अपील की।
प्रधानमंत्री ने कोविड की दूसरी वेब में अस्पतालों की व्यवस्था, दवाओं का उपलब्धता, आक्सीजन की उपलब्धता, बेड की बढ़ी संख्या, टेस्टिंग लैब आदि की संख्या बढ़ाने के लिये युद्ध स्तर पर लगे रहे सभी संस्थानों को साधुवाद दिया। जिसमें रेलवे, वायुसेना, जल सेना, थल सेना आदि प्रासंगिक हैं। पहली लहर की भॉति इस बार भी गरीब नागरिकों की चिंता को दृष्टिगत रखते हुये दीपावली तक लगभग 8 महीने तक 80 करोड़ घरों को नि:शुल्क अनाज की व्यवस्था का संकल्प भी दुहराया। प्रधानमंत्री ने कहा कि पूरा प्रयास रहेगा कि कोई गरीब असहाय ख़ाली पेट ना सोये। वैक्सीनेशन के लिये युद्ध स्तर पर जागरूकता अभियान चलाये जाने की आवश्यकता पर भी प्रधानमंत्री ने ज़ोर दिया।
इस भावनात्मक भाषण में प्रधानमंत्री ने सबका-साथ, सबका-विकास के मंत्र को पुन: दुहराया। पिछले १०० वर्षों में आधुनिक विेश्व में आयी इस सबसे बड़ी महामारी ने पूरे विश्व को त्रस्त किया है। परंतु, इस बार भारत की लड़ाई मज़बूत रही है।अस्पतालों के इंफ़्रास्ट्रक्चर मजबूत हो गये हैं। वैक्सीन का निर्माण युद्ध स्तर पर होने लगा है। भारत में वैक्सीनेशन की तीव्रता समूचे विश्व के लिये आश्चर्य की बात है। हमें गर्व है कि हम एक संघर्षशील राष्ट्र हैं। भारत जीतेगा-कोरोना हारेगा।
(लेखक: डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी, मॉडर्न ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट्स, इदौर में प्रोफ़ेसर एवं समूह निदेशक की भूमिका में कार्यरत हैं)
Contact: +91-9993456731 Email: punit.hyd@gmail.com, www.punitkumardwivedi.com
Friday, 4 June 2021
विश्व पर्यावरण दिवस विशेष-पर्यावरण संरक्षण ही संजीवनी: डॉ. पुनीत द्विवेदी
पर्यावरण संरक्षण ही संजीवनी: डॉ. पुनीत द्विवेदी
Wednesday, 26 May 2021
वायरस युद्ध के काल में बुद्ध की प्रासंगिकता -डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी
वायरस युद्ध के काल में बुद्ध की प्रासंगिकता -डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी
- बुद्ध का प्रभाव चीन-जापान-कोरिया-नेपाल-थाईलैण्ड-तिब्बत-श्री लंका आदि देशों में भी पर्याप्त रहा है।
-बुद्ध की सीख को नज़रअंदाज़ किया है वर्तमान विश्व ने।
- ये वायरस जनित युद्ध ‘बुद्ध की शिक्षाओं’ पर कुठाराघात है।
- ‘बुद्धं शरणम् गच्छामि’ का भाव वर्तमान समाज में अदृश्य हो गया है।
- अहिंसा, विश्व प्रेम एवं बंधुत्व-भाव का हो रहा है लोप।
- पाश्चात्य शैली ने समाज का नाश करने की ठान ली है।
‘बुद्धं शरणम् गच्छामि’ कहते, सुनते या पढ़ते ही मन अपार शांति की अनुभूति करने लगता है। बुद्ध का ध्यान करने मात्र से ही पंचभूतों से बने इस शरीर में अपार शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। महात्मा बुद्ध ने अपने अंतर में इंद्रिय निग्रह के द्वारा परम् शांति की स्थापना की थी। विश्व शांति, प्रेम एवं करुणा की अप्रतिम मूर्ति माने जाते हैं महात्मा बुद्ध। विभिन्न देशों में अनवरत अथक यात्राओं के माध्यम से शांति, प्रेम एवं करूणा के संदेश से जगत को तृप्त करने का अद्भुत प्रयास करने वाले भगवान बुद्ध आज भी और सदा पूजनीय एवं प्रासंगिक रहेंगे।
शांति प्रेम और करुणा ही जीवन के सार है। गौतम बुद्ध ने शांति की खोज में निरंतर भ्रमण एवं यात्रायें कीं। प्रेम के मर्म को जन-जन तक पहुँचाने का यत्न किया। असहायों, पशु-पक्षियों, निराश्रितों के लिये करुणा भाव को धरे विचलित हुये परंतु शांत रहे। जीवन की नश्वरता को जान चुके थे बुद्ध। एक ऐसा ठहराव उनके जीवन में आ चुका था जो स्वयं में परमेश्वर की अनुभूति करने जैसा था। उन्होंने अंगुलीमाल जैसे नृशंस हत्यारे डाकू को भी ठहराव प्रदान किया था। उनके शब्द ‘मैं तो ठहर गया तू कब ठहरेगा’ ने अंगुलीमाल सरीखे कईयों का कल्याण किया है।
वर्तमान वायरस युद्ध काल में भी बुद्ध उतने ही प्रासंगिक हैं। हम बुद्ध के रूप को मानते हैं उनकी शिक्षाओं को नहीं। जबकि, बुद्ध ने राग, रूप, यौवन,विलासिता, राजसुख आदि का त्याग कर बुद्धत्व को प्राप्त किया था। बुद्ध की शिक्षाओं वाली करूणा अब दूर-दूर तक नहीं दीखती। बुद्ध की शिक्षाओं वाली शांति अपने अस्तित्व को ढूँढती अलाप कर रही है। बुद्ध की शिक्षाओं वाले प्रेम एवं बंधुत्व ने अब गलाकाट प्रतियोगिता का स्वरूप ले लिया है। समूचा विश्व वायरस से त्रस्त है। सबके मन एवं मस्तिष्क एक अज्ञात भय से भयभीत हैं। क्या बुद्ध अब युद्ध बन चुके हैं? विचारणीय अब यह है कि अब हम कौन हैं? हम किससे ग्रसित हैं? मानसिक वायरस से या शारीरिक वायरस से? क्या यह मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ ।
भय-लोभ अंधकार हैं जिनसे उबरना ही बुद्ध तत्व को प्राप्त करना है। प्रेम-करूणा एवं विश्व बंधुत्व ही समाज के विकास के लिये एवं सृष्टि के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये आवश्यक है। बाक़ी सब कुछ नश्वर है। इस बुद्ध भाव का बोध प्राणी को मनुष्य से परमेश्वर बनाता है। मन-बुद्धि-विवेक को परम् वैभव तक पहुँचाता है। यही बोधि तत्व है और यही बोधिसत्व है।
✍️ डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी, मॉडर्न ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशन्स, इंदौर में प्रोफ़ेसर एवं समूह निदेशक की भूमिका में कार्यरत हैं।)




